स्वामी श्रद्धानन्द,राष्ट्र रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वाले शुद्धि आंदोलन के प्रणेता: सत्यप्रकाश सिंह विहिप प्रान्त सहमंत्री
23 Dec 2025, 04:31 PM
स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती (1856-1926): शिक्षा, शुद्धि और समरसता के महानायक। सत्यप्रकाश सिंह विहिप काशी प्रान्त सहमंत्री
स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती के पुण्यतिथि पर नमन करते विहिप काशी प्रान्त सहमंत्री सत्यप्रकाश सिंह
बेधड़क News 24
स्वामी श्रद्धानन्द: वैदिक धर्म के रक्षक, शुद्धि आंदोलन के प्रणेता और अछूतोद्धार के महानायकविशेष लेख: पुण्यतिथि पर नमन
विशेष रिपोर्ट: अभिजीत श्रीवास्तव
मिर्जापुर। भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वामी श्रद्धानन्द एक ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने धर्म, समाज और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।महानायक स्वामी जी के पुण्यतिथि के अवसर पर विहिप काशी प्रान्त के सहमंत्री सत्यप्रकाश सिंह की उपस्थिति में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में उन्हें 'राष्ट्र निर्माण का स्तंभ' बताया गया। स्वामी जी का जीवन केवल एक व्यक्ति का इतिहास नहीं, बल्कि हिंदू समाज के पुनर्जागरण की गाथा है।
मुंशीराम से संन्यास और शिक्षा का पुनरुत्थान
22 फरवरी 1856 को पंजाब के जालंधर (ग्राम तलवान) में जन्मे मुंशीराम (स्वामी जी के बचपन का नाम) एक सफल वकील थे। प्रारंभ में नास्तिक विचारों की ओर झुके मुंशीराम के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन तब आया, जब उनकी भेंट स्वामी दयानन्द सरस्वती से हुई। उनके विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने विलासिता का त्याग किया और 1917 में संन्यास ग्रहण कर लिया।शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति को चुनौती देते हुए गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय (हरिद्वार) की स्थापना की, ताकि युवा पीढ़ी प्राचीन वैदिक मूल्यों और आधुनिक ज्ञान के समन्वय के साथ राष्ट्र सेवा के लिए तैयार हो सके।
∆शुद्धि आंदोलन: 'घरवापसी' का ऐतिहासिक शंखनादस्वामी श्रद्धानन्द का सबसे अविस्मरणीय योगदान 'शुद्धि आंदोलन' रहा। उन्होंने अनुभव किया कि छल-कपट या दबाव से हिंदू समाज से अलग किए गए लोगों को वापस लाना धर्म रक्षा के लिए अनिवार्य है।
∆ भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा: 13 फरवरी 1923 को आगरा में 'क्षत्रिय उपकारिणी सभा' के साथ मिलकर उन्होंने इस सभा का गठन किया, जिसमें सनातनी, सिख और जैन सभी मतों का समर्थन मिला। ∆ मलकाना राजपूतों की वापसी: अपनी पुस्तक ‘सेव द डाइंग रेस’ के माध्यम से उन्होंने चेतना जगाई और देखते ही देखते लगभग 30,000 मलकाना मुस्लिम राजपूतों को उनके मूल धर्म में वापस लाए।
∆ व्यापक प्रभाव: उनके प्रयासों से 1923 से 1931 के बीच लगभग 1,83,342 लोगों ने स्वधर्म में वापसी की। उन्होंने दिल्ली में असगरी बेगम (शुद्धि के बाद शांति देवी) जैसी महिलाओं और मेरठ-बुलंदशहर में ईसाई बन चुके सैकड़ों परिवारों को पुनः हिंदू समाज का हिस्सा बनाया।
∆ अछूतोद्धार और सामाजिक समरसतास्वामी जी केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित नहीं थे; वे सामाजिक समानता के प्रखर पक्षधर थे। उन्होंने दलित समाज के उत्थान के लिए जो कार्य किए, उसकी प्रशंसा स्वयं डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने की थी। 1922 में बाबा साहेब ने स्वामी जी को अछूतों का "महानतम और सच्चा हितैषी" कहा था। उन्होंने मंदिरों और कुओं पर वंचित वर्ग के अधिकार के लिए निरंतर संघर्ष किया।महान विभूतियों का समर्थन और सावरकर का योगदान:स्वामी जी के इस महान अभियान को पंडित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, और भारत रत्न बाबू भगवान दास का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। इसी कड़ी में वीर सावरकर ने भी अंडमान की सेल्यूलर जेल में रहते हुए अपने भाइयों के साथ मिलकर मतांतरित कैदियों की शुद्धि का कार्य किया। सावरकर ने अपने नाटक ‘संगीत उ: शाप’ और लेखों के माध्यम से स्वामी जी के विचारों को जन-जन तक पहुँचाया।गांधी जी का विरोध और स्वामी जी की अडिगता:इतिहास का एक दुःखद पहलू यह भी रहा कि जहाँ एक ओर हिंदू महासभा और आर्य समाज शुद्धि कार्य में जुटे थे, वहीं दूसरी ओर महात्मा गांधी और कुछ तत्कालीन कांग्रेस नेताओं ने इस कार्य की आलोचना की थी। स्वामी जी पर कई मुकदमे भी चलाए गए, लेकिन सत्य की राह पर चलते हुए वे कभी विचलित नहीं हुए। अदालतों ने भी उनके कार्यों को वैध ठहराया।बलिदान जो अमर हो गयास्वामी जी की बढ़ती लोकप्रियता और शुद्धि आंदोलन की सफलता से बौखलाकर कट्टरपंथियों ने उनके विरुद्ध घृणा का प्रचार किया। 23 दिसंबर 1926 को, जब स्वामी जी अस्वस्थ होकर बिस्तर पर लेटे थे, 'अब्दुल रशीद' नामक एक उन्मादी ने धोखे से उनकी हत्या कर दी। यह बलिदान धर्म और राष्ट्र की रक्षा की वेदी पर दी गई सर्वोच्च आहुति थी।आज जब समाज 'लव जिहाद' और सुनियोजित धर्मांतरण जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब स्वामी श्रद्धानन्द के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका जीवन सिखाता है कि बिना संगठित हुए समाज सुरक्षित नहीं रह सकता।
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