किसी भी सामान्य ज्ञान और तर्कसंगत विश्लेषण करने वाले व्यक्ति को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इबारत जो स्पष्ट है :

2011 विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट व्यवस्था के विरुद्ध ममता बनर्जी के मजबूत नेतृत्व और शुभेन्दु अधिकारी के लड़ाकू तेवरों ने नन्दी ग्राम आन्दोलन ममता जी की सरकार बनी। ध्यान रखें, यह कम्यूनिस्ट व्यवस्था से उकताए हुए साथ ही निरंकुश कामरेडो (उदंड) कार्य कर्ताओं जान बचाने के‌ लिए जनता द्वारा जो मजबूत मिला उसी ओर सहज प्रस्थान परिणाम था। 2016 आते‌-आते‌ कम्यूनिस्टों के कैडर का टीएमसी करण होने अव्यस्था जनित वातावरण फैलने के वसूली गैंग्स की खतरनाक प्रवृत्ति के कारण उद्योग धंधों का पलायन शुरु हो कर समापन‌ की तरफ‌ तेजी‌ से चल पड़ा। सिंगुर ग्राम की‌ घटना जो टाटासमूह के पलायन का कारण बनी। उसी समय से औद्योगीकरण की निराशा जनक प्रवृत्ति के‌ कारण धीरे-धीरे अन्य कारकों से प्रभावित ममता सरकार के प्रति रुझान दिखने लगे थे। परन्तु मजबूत विकल्प का‌ अभाव‌ और कांग्रेस पार्टी के नकारात्मक नेतृत्व के कारण ममता सरकार बची‌ रही। चूंकि ममता बनर्जी कांग्रेस ने निकली‌ हुई नेता थी इसलिए कांग्रेसी साम्प्रदायिक राजनीति को आधार बनाकर अपनी ‌राजनिति‌ बढ़ाने तथा कांग्रेस को‌‌ समेटने‌ मे‌ सफल‌ होती‌ जा रही थी। ममता एन.डी.ए और यू.पी.ए दोनों में रहकर यह समझ गयी थीं मुस्लिम को साथ लेकर कांग्रेस को आसानी से खत्म किया जा सकता है। बंगाल में लगभग 29 प्रतिशत आबादी के मुस्लिम जनमानस को विशेष छूट और सार्वजनिक मंच से अल्लाहु अकबर ‌का‌ नारा‌ लगाकते‌ हुए अपने उच्च शिखर की ओर चल‌पड़ी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा बंगाल में उपस्थिति तो दिखाने लगी थी परन्तु सीटों की‌दृष्टि से नगण्य थी। 2016 के विधान‌सभा‌ निर्वाचन में ममता सरकार भारी बहुमत से सत्ता में आई परन्तु भाजपा बढ़े‌ मत प्रतिशत‌ के‌ साथ मात्र तीन ‌सीटों‌ तक‌ पहुची।2019 लोकसभा निर्वाचन में कांग्रेस क्षीण होकर सिमट गई और ममता नंबर एक एवं दो ‌सीटों के‌ मामूली‌ अंतर भाजपा नंबर दो पार्टी बन गयी। राजनितिक ‌हिंसा‌ और‌ कानून व्यस्था तथा सामाजिक-आर्थिक और साम्प्रदायिक भेद भाव के कारण जनता को भाजपा विकल्प के रुप दिखने लगी थी। 2021 के विधानसभा निर्वाचन में अपेक्षित परिणाम तो‌ नहीं था परन्तु बंगाल में टीएमसी एवं भाजपा ‌आमने सामने थी। भाजपा 77 तो टीएमसी 200 पार पहुंच गयी। परन्तु कानून व्यवस्था, हत्या एवं बलात्कार तथा साम्प्रदायिक उत्पीड़न ने ‌जनता को भयभीत कर दिया। 2024 लोकसभा निर्वाचन में टीएमसी निरंकुश और भय‌ के‌ वातावरण में 29 सींटों के साथ नंबर एक और 12 सीटों ‌के साथ भाजपा नंबर दो रह गई। परन्तु कांग्रेस अपने न्यूनतम स्थान पर चली गई। कानून व्यवस्था और टीएमसी के कार्य कर्ताओं की गुंडागर्दी व‌ आर्थिक‌ लूटपाट‌‌ने अराजकता का‌ महौल‌ बना‌ दिया था। स्थानीय पुलिस ममता के सारे पर जनता के नहीं वरन् पार्टी के ‌निर्देश‌पर चलने ‌लगी थी। आरजीकर एवं सन्देश खाली जैसी आपराधिक घटनाओं में अपराधियों को बचाने के‌ साथ‌ साथ भ्रष्टाचार और नोटों के बरामद पहाड़ ने‌ लोगों को खिन्न‌तो कर‌ ही दिया था। परन्तु एस.आई.आर के कारण बोगस मतदाताओं के निरसन और ‌सुप्रीम कोर्ट के‌ निर्देशन प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के साथ केन्द्रीय बलों की‌ उपस्थिति‌ ने मतदाताओं को‌ भयमुक्त किया। मत प्रतिशत सर्वाधिक हुआ और जनता का आक्रोश भारी परिवर्तन के रुप में सामने आया।भाजपा 207 तथा टीएमसी 80 पर पहुंची। सत्ता परिवर्तन ने जनता के अन्दर दबी‌घृणा और प्रतिकार की‌ भावना के कारण टीएमसी विघटन की‌ कगार पर‌ पहुच कर‌ कांग्रेस की‌ शरण में पहुंच गयी है। केरलम् के निवर्तमान मुख्यमंत्री पिनराई‌विजयन ने कहा कि "टीएमसी का‌ कोई‌ राजनैतिक कार्यक्रम वर्षाजनितक विचारधारा का आधार नहीं है" इस‌लिए टीएमसी को कोई बचा नहीं सकता।

यह‌ लेखक‌ का‌ मौलिक विचार है।