कजरी : मिर्जापुर की मिट्टी में रची-बसी विरह, प्रेम और सावन की स्वर-साधना
31 Aug 2026, 09:49 AM
मिर्जापुर की कजरी का संबंध केवल सावन के मौसम से नहीं है। इसमें प्रकृति, प्रेम, विरह, श्रृंगार, सामाजिक जीवन, धार्मिक आस्था और स्त्री मन की भावनाओं का अद्भुत संसार दिखाई देता है
बेधड़क News 24
सावन की पहली फुहार पड़ते ही जब विंध्य की धरती हरियाली की चादर ओढ़ती है, आम और नीम की डालियों पर झूले पड़ते हैं और दूर कहीं से किसी लोकगायिका की आवाज सुनाई देती है, तो लगता है जैसे मिर्जापुर की आत्मा बोल उठी हो। यह आवाज किसी सामान्य गीत की नहीं, बल्कि उस लोकपरंपरा की है जिसे हम कजरी या कजली के नाम से जानते हैं।
कजरी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की महत्वपूर्ण लोकगायन परंपरा है। इसके गायन का संबंध विशेष रूप से सावन और वर्षा ऋतु से है। मिर्जापुर को इस लोकविधा की प्रमुख जन्मभूमि और परंपरागत केंद्र के रूप में माना जाता है। हालांकि, इसकी उत्पत्ति को लेकर उपलब्ध साहित्य में अलग-अलग मत और लोककथाएं हैं। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि मिर्जापुर कजरी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जन्मभूमियों में प्रमुख है, न कि इसके उद्भव की हर कथा को प्रमाणित इतिहास मान लिया जाए।
कजरी और मिर्जापुर का रिश्ता
मिर्जापुर की कजरी का संबंध केवल सावन के मौसम से नहीं है। इसमें प्रकृति, प्रेम, विरह, श्रृंगार, सामाजिक जीवन, धार्मिक आस्था और स्त्री मन की भावनाओं का अद्भुत संसार दिखाई देता है। सावन में मायके आई बेटियों की खुशी, ससुराल में रह रही स्त्री की अपने मायके और प्रियजन के लिए तड़प, परदेश गए पति की प्रतीक्षा और वर्षा से जागता प्रेम—इन सभी भावों को कजरी ने अपनी सरल लोकभाषा में स्वर दिया।
मिर्जापुर की कजरी की एक विशिष्ट विशेषता उसका देवी-समर्पण भी है। लोकपरंपरा में कजरी गायन की शुरुआत देवी गीत से करने की बात मिलती है और मिर्जापुर के अनेक लोकगायक अपनी कजरी की पहली स्वरांजलि मां विंध्यवासिनी को समर्पित करते हैं। इसीलिए यहां कजरी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि लोकआस्था का भी माध्यम बन जाती है।
कजरी राजमहलों से चौपाल और फिर मंच तक
कजरी के विकास की कहानी भी कम रोचक नहीं है। मिर्जापुर में समय के साथ कजरी के आयोजन लोकजीवन का हिस्सा बने। साहित्यकार बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ के लेखन में मिर्जापुर के कजरी उत्सवों और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश के उल्लेख मिलते हैं। बाद के दौर में कजरी का संबंध गायन मंडलियों और तवायफों की संगीत परंपरा से भी जुड़ा, जिन्होंने इसे दादरा, ठुमरी आदि उपशास्त्रीय संगीत विधाओं के साथ मंचीय स्वरूप देने में भूमिका निभाई।
यही वह यात्रा थी जिसमें कजरी गांव की चौपाल और सावन के झूले से निकलकर बड़े संगीत मंचों तक पहुंची। बनारस की संगीत परंपरा ने भी इसके विकास और व्यापक प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आगे चलकर कजरी पूर्वी उत्तर प्रदेश से निकलकर बिहार और अन्य भोजपुरी क्षेत्रों में लोकप्रिय हुई।
लोककथा भी है कजरी के इतिहास का हिस्सा
मिर्जापुर की कजरी से जुड़ी एक लोकप्रिय लोककथा कांतित के राजा की पुत्री कजली से संबंधित है। लोकमान्यता के अनुसार पति-वियोग में राजकुमारी कजली द्वारा गाए गए विरह गीतों से कजरी परंपरा का संबंध जोड़ा जाता है। मिर्जापुर में कजरी महोत्सव को भी इस लोककथा से जोड़ा जाता रहा है। लेकिन इसे लोकमान्यता के रूप में ही देखना चाहिए; इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
इसी तरह कजरी शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भी मतभेद हैं। कुछ विद्वान इसे ‘काजल’ या ‘कजरा’ से जोड़ते हैं—सावन के काले बादलों और आंखों के काजल के सांकेतिक संबंध के कारण। यह भी एक व्युत्पत्तिगत मत है, अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं।
मिर्जापुर के लोगों का कजरी से लगाव
मिर्जापुर में कजरी केवल संगीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान है। यहां कजरी सुनना सावन को महसूस करना है। पुराने समय में गांवों के बाग-बगीचों, चौपालों और घर-आंगन में कजरी की महफिलें सजती थीं। स्त्रियां झूले पर बैठकर कजरी गाती थीं और पुरुष गायन मंडलियों में इसे प्रस्तुत करते थे। कहीं सवाल-जवाब की गायकी होती तो कहीं पूरी रात कजरी की महफिलें चलती थीं।
कजरी की लोकप्रियता का अंदाजा उस लोकपंक्ति से भी लगाया जा सकता है—
“लीला रामनगर की भारी,कजरी मिर्जापुर सरनामा।”
यह पंक्ति मिर्जापुर की कजरी के प्रति लोकसमाज के गौरव और लगाव को अभिव्यक्त करती है।
आज संरक्षण की जरूरत
समय बदल रहा है। मनोरंजन के आधुनिक साधनों, बदलती जीवनशैली और नई पीढ़ी की बदलती रुचियों के बीच पारंपरिक कजरी गायन की पुरानी महफिलें पहले जैसी दिखाई नहीं देतीं। मिर्जापुर में कजरी की परंपरा के सामने कलाकारों को मंच और संसाधनों की कमी तथा नई पीढ़ी की घटती रुचि जैसी चुनौतियों का उल्लेख भी सामने आया है।
ऐसे में कजरी को केवल सालाना कजरी महोत्सव तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालयों और महाविद्यालयों में कजरी पर परिचर्चा, लोकगायकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम, गांवों में पारंपरिक कजरी प्रतियोगिताएं, पुराने कजरी गीतों का दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने की पहल जरूरी है।
अंतिम बात
मिर्जापुर की कजरी दरअसल इस धरती की स्मृति और संवेदना का संगीत है। इसमें सावन की हरियाली है, बादलों की गूंज है, विरह की पीड़ा है, प्रेम की मिठास है और मां विंध्यवासिनी के प्रति आस्था भी।
इसलिए कजरी को केवल एक लोकगीत कहना उसके महत्व को छोटा करना होगा। यह मिर्जापुर की लोक-स्मृति का ऐसा अध्याय है, जिसमें कई पीढ़ियों की आवाजें सुरक्षित हैं। कजरी बचेगी तो केवल एक गीत नहीं बचेगा, बल्कि मिर्जापुर की एक पूरी सांस्कृतिक पहचान जीवित रखता है।
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