चकिया (चंदौली)। स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर योगी सरकार लगातार पारदर्शिता, जवाबदेही और कठोर कार्रवाई की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। चकिया कस्बे और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में फर्जी डायग्नोस्टिक सेंटरों का एक संगठित रैकेट खुलेआम फल-फुल रहा है। हैरानी की बात यह है कि यह पुरा खेल स्वास्थ्य विभाग की नाक के नीचे, और कई बार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के ठीक सामने संचालित हो रहा है।

इस फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा उदाहरण है केयर डायग्नोस्टिक सेंटर चकिया जो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चकिया के सामने ही बिना मानक और बिना योग्य डॉक्टर के चल रहा है। यहाँ रोजाना सैकड़ों मरीज आते हैं और उन्हें वही रिपोर्टें दी जाती हैं जिन पर किसी ‘डॉक्टर’ के नाम की मुहर तो होती है, लेकिन मौके पर वह डॉक्टर मिलता नहीं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि—

क्या CMO चंदौली वाई.के. राय को इस खेल की खबर नहीं?

या फिर खबर होने के बावजूद कार्रवाई न करने के पीछे कोई ख़ास वजह?

स्थानीय लोगों का आरोप साफ है—"सीएमओ को सब पता है, लेकिन कार्रवाई नहीं कर रहे।"

इस रिपोर्ट में हमारी टीम ने चकिया और आसपास के डायग्नोस्टिक सेंटरों की जांच, स्थानीय लोगों के बयान, स्वास्थ्य विशेषज्ञों से राय और सरकारी नियम-कायदों का विश्लेषण कर पूरा सच सामने रखा है।

चकिया में डायग्नोस्टिक सेंटरों का बड़ा नेटवर्क 

चकिया बाजार, अस्पताल रोड, नगरीय मोहल्लों और ग्रामीण संपर्क मार्गों पर 25 से ज्यादा छोटे-बड़े डायग्नोस्टिक सेंटर और लैब सेंटर चल रहे हैं। जिसमें अल्ट्रासाउंड सेंटर, ब्लड टेस्ट लैब, एक्स-रे यूनिट, इसीजी सेंटर, पैथोलॉजी लैब, थाइराइड/लिवर/किडनी टेस्ट यूनिट जैसी सेवाएं प्रदान करने का दावा किया जाता है।

परंतु जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इनमें से 60–70% सेंटरों के पास न तो वैध लाइसेंस है, न ही कोई पंजीकरण। लैब में कार्यरत लोग डॉक्टर नहीं, बल्कि 10वीं-12वीं पास युवा हैं जिन्हें मशीन चलाने का मात्र प्रशिक्षण दिया गया है। रिपोर्ट पर डॉक्टर शाहब का नाम छपता है, लेकिन वह डॉक्टर शाहब मौके पर कभी नहीं दिखते। यह सब कुछ सीधे-सीधे उपभोक्ता धोखाधड़ी और चिकित्सा अधिनियम के स्पष्ट उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

सरकारी स्वास्थ्य केंद्र के सामने ही अवैध सेंटर

चकिया के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के ठीक सामने स्थित केयर डायग्नोस्टिक सेंटर इस रैकेट का सबसे चमकदार उदाहरण साबित हो रहा है। स्थानीय नागरिकों ने बताया कि आज तक हमने यहां किसी डॉक्टर को बैठते नहीं देखा। सिर्फ कंप्यूटर, मशीन और रिपोर्ट थमाने वाले दो-चार लड़के ही दिखते हैं।”

जानकारी के मुताबिक—

➤ सेंटर के पास न NOC, न मानक, न ही कोई क्वालिफाइड पैथोलॉजिस्ट।

➤ रिपोर्टों पर जिस डॉक्टर का नाम और हस्ताक्षर छपता है, वह डॉक्टर महीनों से यहां नहीं आया।

इसी वजह से कई मरीजों को गलत रिपोर्ट मिलने से गंभीर दिक्कतें भी सामने आई हैं।

फर्जी रिपोर्ट का खेल – मशीनें चलाने वाले लड़के ही ‘डॉक्टर’ बन गए!

नियम क्या कहते हैं? और चकिया में हो क्या रहा है?

भारतीय चिकित्सा परिषद एवं स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार:

किसी भी पैथोलॉजी लैब या डायग्नोस्टिक सेंटर को चलाने के लिए जरूरत होती है—

1.क्वालिफाइड पैथोलॉजिस्ट (MD Pathology या DCP)

2. मेडिकल प्रैक्टिस लाइसेंस

3. CMO कार्यालय से पंजीकरण

4. मानक उपकरण और मशीनें

5. प्रशिक्षित तकनीशियन

6. मशीनों की नियमित कैलिब्रेशन

7. LIMS रिकॉर्ड

8. बायो-मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल सिस्टम

लेकिन चकिया की हकीकत ये है—

न पैथोलॉजिस्ट, न लाइसेंस, न पंजीकरण, न बायोमेडिकल वेस्ट सिस्टम, न मानक मशीनें सब कुछ सिर्फ नाम, मुहर और पैसे के भरोसे चल रहा है।

सबसे बड़ा सवाल – CMO चंदौली को जानकारी क्यों नहीं?

जिन सेंटरों के बारे में आम जनता तक को जानकारी है कि वे फर्जी चल रहे हैं, क्या CMO कार्यालय को इस बात की भनक नहीं?

कई स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया—

> “CMO वाई.के. राय को बार-बार शिकायत की गई,

लेकिन कार्रवाई नहीं होती।”

> “चकिया में जितने भी फर्जी लैब चल रही हैं,

सबको CMO दफ्तर का संरक्षण प्राप्त है।”

कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा—

> “इन्हीं फर्जी लैबों से हर महीने सेटिंग–गेटिंग का खेल चलता है।”

इन आरोपों की जांच जरूरी है, क्योंकि—

सरकारी अस्पताल के ठीक सामने अवैध सेंटर चल रहा है, और CMO को पता न हो—यह सवाल खुद जवाब मांगता है।

क्यों बढ़ रहा है फर्जी डायग्नोस्टिक का बाजार?

समाजसेवियों कीजांच के दौरान पता चला कि चकिया और आसपास के इलाकों में फर्जी डायग्नोस्टिक सेंटर तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं—

कारण 1: ग्रामीण क्षेत्रों की अनभिज्ञता

लोग रिपोर्ट सही है या गलत, यह समझ ही नहीं पाते।

कारण 2: डॉक्टरों का रेफरल खेल

कुछ निजी डॉक्टर कमीशन के लिए ऐसे सेंटरों को बढ़ावा देते हैं।

कारण 3: स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही

सीएमओ से लेकर स्वास्थ्य निरीक्षक तक, कोई भी सक्रिय नहीं।

कारण 4: सरकारी अस्पतालों में टेस्ट न होना

PHC और CHC में मशीनें होने के बावजूद टेस्ट नहीं किए जाते।

इससे निजी लैबों की चांदी है।

कारण 5: लाइसेंस चेकिंग जीरो

चकिया में पिछले कई सालों से डायग्नोस्टिक सेंटरों की—

जांच

सीलिंग

लाइसेंस रिव्यू

किसी भी स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई।

फर्जी रिपोर्टों का सीधा असर – मरीज हो रहे हैं बर्बाद

इन फर्जी सेंटरों की गलत रिपोर्टों का सबसे खतरनाक असर उन मरीजों पर पड़ता है, जो—

गर्भवती महिलाएं

बुजुर्ग

हार्ट पेशेंट

डाइबिटिक

किडनी रोगी

जैसे संवेदनशील वर्गों से हैं।

गलत रिपोर्ट = गलत इलाज = खतरा

डॉक्टर भी गलत रिपोर्ट देखकर गलत दवा लिख देता है।

कई मामलों में—

गर्भपात

गलत दवा से रिएक्शन

अनावश्यक ऑपरेशन

दवा का भारी खर्च

मानसिक तनाव

जैसी घटनाएं सामने आई हैं।

*स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय – “यह गंभीर अपराध है”*

वाराणसी के एक वरिष्ठ पैथोलॉजिस्ट ने बताया—

> “बिना पैथोलॉजिस्ट के लैब चलाना

IPC की धारा 420, 467, 468, 471 के तहत गंभीर अपराध है।

यदि किसी मरीज की मौत गलत रिपोर्ट के कारण होती है तो

धारा 304A (कुशासन से मौत) लागू होती है।”

एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा—

> “NABL मान्यता तो दूर, इन लैबों में मशीनें तक मानक के अनुरूप नहीं होतीं।”

*कैमरों में कैद – डॉक्टर का नाम, डॉक्टर गायब*

हमारी टीम ने कई रिपोर्टों की प्रतियां देखीं जिन पर—

डॉक्टर की मुहर

डॉक्टर के हस्ताक्षर

रजिस्ट्रेशन नंबर

सब कुछ छपा हुआ था।

लेकिन जब उस डॉक्टर की लोकेशन या उपस्थिति पूछी गई तो सेंटर कर्मियों ने कहा—

> “सर आते-जाते रहते हैं…"

“अभी नहीं हैं…"

“फोन पर देख लेते हैं…”

सबसे मुद्दे की बात यह है कि डॉक्टर सिर्फ ‘नाम’ देकर अपनी मुहर बेच रहा है।

*क्या सरकारी मिलीभगत है?*

कई सूचनाओं से यह संकेत मिलता है कि—

अवैध सेंटरों की सूची स्वास्थ्य विभाग को पता है।

निरीक्षक मौके पर जाकर कभी कार्रवाई नहीं करते।

शिकायतों को कूड़ेदान में डाला जाता है।

कई सेंटर CMO कार्यालय में ‘नियमित चक्कर’ लगाते हैं।

कुछ स्थानीय लोगों का दावा है—

> “लाइसेंस न होने के बावजूद, सेटिंग के आधार पर सेंटर चलते हैं।

नियम सिर्फ बड़े नामों के लिए हैं, छोटे कस्बों में कोई पूछने वाला नहीं।”

*आखिर सरकार कब जागेगी? – ग्रामीणों की नाराजगी बढ़ रही है*

चकिया और शहाबगंज, नौगढ़, धीना, समेत अन्य क्षेत्रों के ग्रामीणों में गुस्सा बढ़ रहा है।

उनका कहना है—

लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ हो रहा है

सरकार मूकदर्शक

स्वास्थ्य विभाग ‘पकड़म-पकड़ाई’ खेल रहा है

PHC के सामने ही फर्जी सेंटर चल रहा है — इस पर कार्रवाई न होना शर्मनाक

एक स्थानीय व्यापारी ने कहा—

> “यह पूरी तरह से संगठित रैकेट है।

अगर सरकार चाहे तो 48 घंटे में चकिया की सारी अवैध लैबें बंद हो जाएं।”

हमने CMO चंदौली से प्रतिक्रिया मांगी

सीएमओ वाई.के. राय को कॉल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया—

> “करवाई करेंगे।

जो भी सेंटर बिना लाइसेंस चल रहे हैं उनकी जांच होगी।”

परन्तु स्थानीय लोग कहते हैं—

> “ये जवाब पिछले कई साल से सुना जा रहा है।

कार्रवाई ज़ीरो है।”

*फर्जी डायग्नोस्टिक रैकेट पर लगाम जरूरी*

चकिया में फर्जी डायग्नोस्टिक सेंटरों का यह कारोबार न सिर्फ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर करारा तमाचा है, बल्कि आम जनता की जान के साथ खुला खिलवाड़ भी है।

जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के सामने ही बिना लाइसेंस सेंटर चल रहा है और CMO कार्रवाई नहीं कर रहे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यवस्था बीमार है।

यदि तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो—

गलत इलाज

गलत रिपोर्ट

अनावश्यक ऑपरेशन

गंभीर स्वास्थ्य खतरे

जारी रहेंगे, और सबसे अधिक नुकसान गरीब और ग्रामीण तबके को उठाना पड़ेगा।